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Saturday, June 30, 2007

मेले

कुमाऊँ की संस्कृति यहाँ के मेलों में समाहित है । रंगीले कुमाऊँ के मेलों में ही यहाँ का सांस्कृतिक स्वरुप निखरता है । धर्म, संस्कृति और कला के व्यापक सामंजस्य के कारण इस अंचल में मनाये जाने वाले उत्सवों का स्वरुप बेहद कलात्मक होता है । छोटे-बड़े सभी पर्वों?, आयोजनों और मेलों पर शिल्प की किसी न किसी विद्या का दर्शन अवश्य होता है । कुमाऊँनी भाषा में मेलों को कौतिक कहा जाता है । कुछ मेले देवताओं के सम्मान में आयोजित होते हैं तो कुछ व्यापारिक दृष्टि से अपना महत्व रखते हुए भी धार्मिक पक्ष को पुष्ट अवश्य करते है । पूरे अंचल में स्थान-स्थान पर पचास से अधिक मेले आयोजित होते हैं जिनमें यहाँ का लोक जीवन, लोक नृत्य, गीत एवं परम्पराओं की भागीदारी सुनिश्चित होती है । साथ ही यह धारणा भी पुष्टि होती है कि अन्य भागों में मेलों, उत्सवों का ताना बाना भले ही टूटा हो, यह अंचल तो आम जन की भागीदारी से मनाये जा रहे मेलों से निरन्तर समद्ध हो रहा है ।

मेला चारे जिस स्थान पर भी आयोजित हो रहा हो, उसका परिवेश कैसा भी हो, उसका परिवेश कैसा भी हो, अवसर ऐतिहासिक हो, सांस्कृतिक हो, धार्मिक हो या फिर अन्य कोई उल्लास से चहकते ग्रामीणों को आज भी अपनी संस्कृति, अपने लोग, अपना रंग, अपनी उमंग, अपना परिवार इन्हीं मेलों में वापस मिलते हैं । सुदूर अंचलों में तो बरसों का बिछोह लिये लोग मिलन का अवसर मेलों में ही तलाशते हैं ।

कुमाऊँ मंडल के तीनों जिलों में सम्पन्न होने वाले कुछ प्रसिद्ध मेले इस प्रकार हैं -

नंदादेवी मेला-अल्मोड़ा

नंदादेवी मेला-नैनीताल

कोट की माई का मेला

स्याल्दे - बिखौती का मेला

उत्तरायणी मेला - बागेश्वर

दशहरा महोत्सव - अल्मोड़ा

बगवाल : देवीधुरा मेला

पूर्णागिरी मेला

थल मेला

जौलजीवी मेला - जनपद पिथौरगढ़

मोष्टामाणू का मेला - जनपद पिथौरागढ़

रामेश्वर का मेला - जनपद पिथौरागढ़

गबलादेव का मेला - जनपद पिथौरागढ़

चैती मेला - काशीपुर

कुमाऊँ के कुछ अन्य प्रसिद्ध मेले
हरेला मेला
कालसन का मेला
जियारानी का मेला




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